श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 37: माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.37.9 
यथा स यज्ञो न भवेद् यथा वापि पराभव:।
जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हमें जनमेजय के यज्ञ को टालने या उसमें विघ्न डालने का उपाय सोचना चाहिए, जो सर्पों के नाश के लिए किया जा रहा था ॥9॥
 
We must think of a way to avert or create obstacles in the sacrifice of Janamejaya, which was being conducted to destroy the snakes. ॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)