तस्मात् सम्मन्त्रयामोऽद्य भुजङ्गानामनामयम्।
यथा भवेद्धि सर्वेषां मा न: कालोऽत्यगादयम्॥ ७॥
सर्व एव हि नस्तावद् बुद्धिमन्तो विचक्षणा:।
अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे॥ ८॥
यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम्।
अनुवाद
अतः आज हमें उस उपाय पर भली-भाँति विचार करना चाहिए जिससे हम सभी सर्प शान्तिपूर्वक रह सकें। अब हमें समय नष्ट नहीं करना चाहिए। हम सभी सर्प प्रायः बुद्धिमान और चतुर हैं। यदि हम मिलकर विचार-विमर्श करें, तो इस संकट से मुक्ति का उपाय अवश्य निकाल लेंगे; जैसे पूर्वकाल में देवताओं ने गुफा में छिपी अग्नि को खोज निकाला था। ॥7-8 1/2॥
Therefore, today we should think well about the means by which all of us snakes can live peacefully. Now we should not waste time. Almost all of us snakes are intelligent and clever. If we discuss together, we will find a way to get rid of this crisis; just like in the past, the gods had discovered the fire hidden in the cave. ॥ 7 - 8 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥