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श्लोक 1.37.32  |
किं तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत् ।
श्रेय:प्रसाधनं मन्ये कश्यपस्य महात्मन:॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| 'ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए, जिससे तुम्हारा कल्याण हो? मैं महात्मा काश्यपजी को प्रसन्न करने में ही अपना कल्याण समझता हूँ।' 32. |
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| 'What should be done in such a situation, which would be beneficial for you. I feel my welfare lies in pleasing Mahatma Kashyapji. 32. |
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