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mahabharat 1.37.31: हे सर्पो! तुम्हारी बुद्धि ने जो निश्चय किया है, वह आचरण में लाने योग्य नहीं है। इसी प्रकार मेरा विचार भी सभी सर्पों को स्वीकार्य हो, यह भी सम्भव नहीं है। ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 1.37: माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 37: माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.37.31 
नैषा वो नैष्ठिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमा:।
सर्वेषामेव मे बुद्धि: पन्नगानां न रोचते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे सर्पो! तुम्हारी बुद्धि ने जो निश्चय किया है, वह आचरण में लाने योग्य नहीं है। इसी प्रकार मेरा विचार भी सभी सर्पों को स्वीकार्य हो, यह भी सम्भव नहीं है। ॥31॥
 
‘O snakes! The decision that your intellect has made is not worth putting into practice. Similarly, it is not possible that my idea is acceptable to all the snakes. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)