श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 37: माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.37.23 
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्छतशोऽथ सहस्रश:।
जनान् दशन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति॥ २३॥
 
 
अनुवाद
अथवा सब सर्प उस यज्ञ में जाकर सैकड़ों और हजारों मनुष्यों को डस लें; ऐसा करने से हमें कोई भय नहीं रहेगा॥ 23॥
 
‘Or let all the serpents go to that sacrifice and bite hundreds and thousands of people; by doing so there will be no fear for us.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)