अथवा य उपाध्याय: क्रतोस्तस्य भविष्यति।
सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रत:॥ १६॥
तं गत्वा दशतां कश्चिद् भुजङ्ग: स मरिष्यति।
तस्मिन् मृते यज्ञकारे क्रतु: स न भविष्यति॥ १७॥
अनुवाद
'अथवा जो उस यज्ञ का आचार्य होगा, जो सर्पयज्ञ की विधि का ज्ञाता होगा और जो राजा के कार्य तथा कल्याण में लगा रहेगा, उसे सर्प जाकर डस लेगा। तब उसकी मृत्यु हो जाएगी। जब यज्ञ कराने वाला आचार्य मर जाएगा, तब वह यज्ञ स्वतः ही बंद हो जाएगा।॥16-17॥
‘Or the one who will be the Acharya of that Yagya, who has the knowledge of the method of the snake sacrifice and who is engaged in the work and welfare of the king, a snake will go and bite him. Then he will die. When the Acharya conducting the Yagya dies, that Yagya will stop automatically.॥ 16-17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥