श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 37: माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.37.11 
एके तत्राब्रुवन् नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभा:।
जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उस समय कुछ सर्पों ने कहा, 'आओ, हम श्रेष्ठ ब्राह्मण बनकर जनमेजय से यह भिक्षा मांगें कि आपका यज्ञ न किया जाए।'
 
At that time some serpents said, 'Let us become the best of Brahmins and ask this alms from Janamejaya that your yagna should not be performed.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)