श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.36.24 
सौतिरुवाच
अधोभूमौ वसत्येवं नागोऽनन्त: प्रतापवान्।
धारयन् वसुधामेक: शासनाद् ब्रह्मणो विभु:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! इस प्रकार महाप्रतापी नागदेवता अनन्त ही ब्रह्माजी की आज्ञा से इस सम्पूर्ण पृथ्वी को धारण करते हैं और पृथ्वी के नीचे पाताल में निवास करते हैं॥ 24॥
 
Ugrashravaji says - Shaunak! In this way the majestic serpent God Ananta alone holds this entire earth by the order of Brahmaji and resides in the netherworld beneath the earth.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)