श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.36.17 
शेष उवाच
एष एव वरो देव काङ्क्षितो मे पितामह।
धर्मे मे रमतां बुद्धि: शमे तपसि चेश्वर॥ १७॥
 
 
अनुवाद
शेषजी बोले - हे प्रभु! पितामह! परमेश्वर! मैं तो यही वर चाहता हूँ कि मेरी बुद्धि सदैव धर्म, संयम और तप में ही लगी रहे॥ 17॥
 
Sheshji said - O Lord! Grandfather! Supreme God! The only boon I desire is that my intellect should always remain focused on religion, self-control and austerity.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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