श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.36.16 
दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि।
दिष्टॺा बुद्धिश्च ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम।
भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मेरा तुम पर बड़ा प्रेम है; इसलिए आज मैं तुम्हें अवश्य वर देता हूँ। पन्नगोत्तम! यह सौभाग्य है कि तुम्हारी बुद्धि धर्म में दृढ़ है। मैं तुम्हें यह भी आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि धर्म में ही स्थिर रहे।॥16॥
 
‘I have great love for you; therefore today I will certainly grant you a boon. Pannagottama! It is fortunate that your intellect is firmly engaged in Dharma. I also bless you that your intellect may continue to be steadfast in Dharma.'॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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