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mahabharat 1.34.8: 'यदि तुम्हें स्वयं अमृत की आवश्यकता नहीं है, तो उसे मुझे लौटा दो। जिन्हें तुम यह अमृत देना चाहते हो, वे इसे पीकर हमें दुःख पहुँचाएँगे।'॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.34.8 
न कार्यं यदि सोमेन मम सोम: प्रदीयताम्।
अस्मांस्ते हि प्रबाधेयुर्येभ्यो दद्याद् भवानिमम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'यदि तुम्हें स्वयं अमृत की आवश्यकता नहीं है, तो उसे मुझे लौटा दो। जिन्हें तुम यह अमृत देना चाहते हो, वे इसे पीकर हमें दुःख पहुँचाएँगे।'॥8॥
 
'If you yourself do not need the nectar, then give it back to me. Those to whom you want to give this nectar will drink it and cause us pain.'॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)