श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  1.34.6-7 
सौतिरुवाच
इत्युक्तवचनं वीरं किरीटी श्रीमतां वर:।
आह शौनक देवेन्द्र: सर्वलोकहित: प्रभु:॥ ६॥
एवमेव यथात्थ त्वं सर्वं सम्भाव्यते त्वयि।
संगृह्यतामिदानीं मे सख्यमत्यन्तमुत्तमम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! वीर गरुड़ की यह बात सुनकर, सज्जनों में श्रेष्ठ और समस्त लोकों के हितकारी, किरीटधारी भगवान देवेन्द्र ने कहा - 'मित्र! तुम्हारा कहना सत्य है। तुमसे सब कुछ संभव है। इस समय तुम मेरी उत्तम मित्रता स्वीकार करो।' 6-7.
 
Ugrasravaji says - Shaunak! On hearing this from the brave Garuda, the crowned Lord Devendra, the best amongst gentlemen and the benefactor of all the worlds, said - 'Friend! It is true as you say. Everything is possible with you. At this time, accept my best friendship. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)