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mahabharat 1.34.5: अथवा यदि समस्त जड़-चेतन जगत् को एकत्रित करके मुझ पर रख दिया जाए, तो भी मैं उन सबको बिना किसी प्रयास के ही उठा सकता हूँ। इससे तुम मेरे अपार बल का अनुमान कर सकते हो ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.34.5 
सर्वान् सम्पिण्डितान् वापि लोकान् सस्थाणुजङ्गमान् ।
वहेयमपरिश्रान्तो विद्धीदं मे महद् बलम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अथवा यदि समस्त जड़-चेतन जगत् को एकत्रित करके मुझ पर रख दिया जाए, तो भी मैं उन सबको बिना किसी प्रयास के ही उठा सकता हूँ। इससे तुम मेरे अपार बल का अनुमान कर सकते हो ॥5॥
 
Or if all the animate and inanimate worlds are collected and placed on me, I can carry them all without any effort. From this you can understand my immense strength. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)