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mahabharat 1.34.24: तभी से पवित्र अमृत के स्पर्श से कुशा 'पवित्री' नाम से विख्यात हुई। इस प्रकार महात्मा गरुड़ ने देवलोक से अमृत का अपहरण करके उसे सर्पों के पास पहुँचाया; साथ ही सर्पों को द्विजिह्व (दो जिह्वा वाला) बना दिया॥ 24॥   |   mahabharat अध्याय 1.34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.34.24 
अभवंश्चामृतस्पर्शाद् दर्भास्तेऽथ पवित्रिण:।
एवं तदमृतं तेन हृतमाहृतमेव च।
द्विजिह्वाश्च कृता: सर्पा गरुडेन महात्मना॥ २४॥
 
 
अनुवाद
तभी से पवित्र अमृत के स्पर्श से कुशा 'पवित्री' नाम से विख्यात हुई। इस प्रकार महात्मा गरुड़ ने देवलोक से अमृत का अपहरण करके उसे सर्पों के पास पहुँचाया; साथ ही सर्पों को द्विजिह्व (दो जिह्वा वाला) बना दिया॥ 24॥
 
Since then, Kusha became known as 'Pavitri' due to the touch of the holy nectar. In this way, Mahatma Garuda kidnapped the nectar from Devlok and brought it to the snakes; along with that, he made the snakes Dwijihva (having two tongues).॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)