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mahabharat 1.34.2: शतक्रतो! मुनिगण अपने बल की स्वेच्छापूर्वक प्रशंसा करना तथा अपने गुणों का अपने मुख से वर्णन करना अच्छा नहीं मानते॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.34.2 
कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्त: स्वबलसंस्तवम्।
गुणसंकीर्तनं चापि स्वयमेव शतक्रतो॥ २॥
 
 
अनुवाद
शतक्रतो! मुनिगण अपने बल की स्वेच्छापूर्वक प्रशंसा करना तथा अपने गुणों का अपने मुख से वर्णन करना अच्छा नहीं मानते॥2॥
 
Shatkrato! Sages do not consider it good to voluntarily praise their strength and speak of their virtues through their own mouth. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)