श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 17-19
 
 
श्लोक  1.34.17-19 
अथ सर्पानुवाचेदं सर्वान् परमहृष्टवत्।
इदमानीतममृतं निक्षेप्स्यामि कुशेषु व:॥ १७॥
स्नाता मंगलसंयुक्तास्तत: प्राश्नीत पन्नगा:।
भवद्भिरिदमासीनैर्यदुक्तं तद्वचस्तदा॥ १८॥
अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे।
यथोक्तं भवतामेतद् वचो मे प्रतिपादितम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे अत्यन्त प्रसन्न होकर समस्त सर्पों से इस प्रकार बोले - 'पन्नगो! मैं यह अमृत तुम्हारे लिए लाया हूँ। इसे कुशा पर रख रहा हूँ। तुम सब लोग स्नान करके शुभ कर्म (स्वस्तिक आदि) करके इस अमृत का पान करो। तुमने मुझे अमृत लाने के लिए भेजते समय यहाँ बैठे-बैठे जो बातें कही थीं, उनके अनुसार आज से मेरी माताएँ दासत्व से मुक्त हो जाएँ; क्योंकि मैंने तुम्हारा बताया हुआ कार्य पूर्ण कर दिया है।'॥17-19॥
 
Thereafter, being very pleased, he spoke to all the snakes in this manner-'Pannago! I have brought this nectar for you. I am placing it on the kusha grass. All of you drink this nectar after taking bath and performing auspicious rituals (reciting swastikas etc.). As per the things you had told me while sitting here while sending me for the nectar, from today onwards my mothers should be freed from servitude; because I have completed the work you had told me.'॥ 17-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)