श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 33: गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.33.4 
तस्यान्तरं स दृष्ट्वैव पर्यवर्तत खेचर:।
अरान्तरेणाभ्यपतत् संक्षिप्याङ्गं क्षणेन ह॥ ४॥
 
 
अनुवाद
गरुड़ पक्षी वहाँ खड़े होकर उसके अन्दर के छिद्र को, अर्थात् उसमें प्रवेश करने के मार्ग को देखते रहे। फिर क्षण भर में उन्होंने अपने शरीर सिकोड़ लिए और पहिये के आरों से होकर अन्दर प्रवेश कर गए॥4॥
 
The birds Garuda stood there watching the hole inside it – the way to enter it. Then in a moment they contracted their bodies and entered inside through the spokes of the wheel.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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