श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 33: गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.33.2 
सचक्रं क्षुरपर्यन्तमपश्यदमृतान्तिके।
परिभ्रमन्तमनिशं तीक्ष्णधारमयस्मयम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
उसने देखा कि अमृत के पास एक लोहे का चक्र घूम रहा था। उसमें चाकू लगे हुए थे। वह लगातार घूम रहा था और उसकी धार बहुत तेज़ थी।
 
He saw that an iron wheel was rotating near the nectar. There were knives attached to it. It kept moving continuously and its edge was very sharp.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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