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श्लोक 1.32.1-2  |
सौतिरुवाच
ततस्तस्मिन् द्विजश्रेष्ठ समुदीर्णे तथाविधे।
गरुड: पक्षिराट् तूर्णं सम्प्राप्तो विबुधान् प्रति॥ १॥
तं दृष्ट्वातिबलं चैव प्राकम्पन्त सुरास्तत:।
परस्परं च प्रत्यघ्नन् सर्वप्रहरणान्युत॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| उग्रश्रवाजी कहते हैं - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! जब देवताओं का समूह इस प्रकार नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध के लिए तैयार हो गया, उस समय पक्षीराज गरुड़ तुरंत ही देवताओं के पास पहुँचे। उस अत्यंत पराक्रमी गरुड़ को देखकर समस्त देवता काँप उठे। उनके समस्त अस्त्र-शस्त्र एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे॥1-2॥ |
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| Ugrashravaji says - O best of the Brahmins! When the group of gods were thus equipped with various weapons and got ready for the war, at that time the bird king Garuda immediately reached the gods. Seeing that very powerful Garuda, all the gods trembled. All their weapons started striking each other.॥1-2॥ |
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