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mahabharat 1.31.33: कश्यपजी के ऐसा कहने पर देवराज इन्द्र निःसंकोच स्वर्ग को चले गए। विनता भी अपनी मनोकामना पूर्ण होने से अत्यंत प्रसन्न हुई।   |   mahabharat अध्याय 1.31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.31.33 
एवमुक्तो जगामेन्द्रो निर्विशङ्कस्त्रिविष्टपम्।
विनता चापि सिद्धार्था बभूव मुदिता तथा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कश्यपजी के ऐसा कहने पर देवराज इन्द्र निःसंकोच स्वर्ग को चले गए। विनता भी अपनी मनोकामना पूर्ण होने से अत्यंत प्रसन्न हुई।
 
After Kashyapji said this, Devraj Indra went to heaven without any doubt. Vinata was also very happy as her wish was fulfilled.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)