श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  1.31.22-23 
वालखिल्या ऊचु:
इन्द्रार्थोऽयं समारम्भ: सर्वेषां न: प्रजापते।
अपत्यार्थं समारम्भो भवतश्चायमीप्सित:॥ २२॥
तदिदं सफलं कर्म त्वयैव प्रतिगृह्यताम्।
तथा चैवं विधत्स्वात्र यथा श्रेयोऽनुपश्यसि॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वालखिल्यों ने कहा - प्रजापति! हमारा यह अनुष्ठान इन्द्र के लिए किया गया था और आपका यह यज्ञ संतान प्राप्ति के लिए किया गया था। अतः आप इस अनुष्ठान को इसके फल सहित स्वीकार करें और जो सबके लिए हितकर प्रतीत हो, वही करें॥ 22-23॥
 
The Valakhilyas said - Prajapati! This ritual of ours was performed for Indra and this Yajna ceremony of yours was desired for children. Therefore, you should accept this ritual along with its results and do that which seems to be beneficial for everyone.॥ 22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)