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mahabharat 1.31.14: 'वह इन्द्र से सौ गुना अधिक पराक्रमी और साहसी हो। उसकी गति मन के समान तीव्र हो। हमारी तपस्या के फलस्वरूप ऐसा योद्धा प्रकट हो जो इन्द्र को भी भयभीत कर दे।'॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.31.14 
इन्द्राच्छतगुण: शौर्ये वीर्ये चैव मनोजव:।
तपसो न: फलेनाद्य दारुण: सम्भवत्विति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'वह इन्द्र से सौ गुना अधिक पराक्रमी और साहसी हो। उसकी गति मन के समान तीव्र हो। हमारी तपस्या के फलस्वरूप ऐसा योद्धा प्रकट हो जो इन्द्र को भी भयभीत कर दे।'॥14॥
 
'He should be hundred times more valour and courage than Indra. His speed should be as fast as the mind. As a result of our penance, such a warrior should appear who would be terrifying for Indra.'॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)