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mahabharat 1.31.12: ब्राह्मणों! सुनो, मैं तुमसे कहता हूँ कि वे महातपस्वी वालखिल्य मन में कामनाओं को रखकर छोटे-बड़े मन्त्रों का जप करके विधिपूर्वक अग्नि में क्या आहुति देते थे॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 31: इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.31.12 
जुहुवुस्ते सुतपसो विधिवज्जातवेदसम्।
मन्त्रैरुच्चावचैर्विप्रा येन कामेन तच्छृणु॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों! सुनो, मैं तुमसे कहता हूँ कि वे महातपस्वी वालखिल्य मन में कामनाओं को रखकर छोटे-बड़े मन्त्रों का जप करके विधिपूर्वक अग्नि में क्या आहुति देते थे॥12॥
 
Brahmins! Listen, let me tell you what that great ascetic Valakhilya used to offer as an offering to the fire in a systematic manner by chanting small and big mantras keeping the desires in his mind. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)