श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.30.7 
गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगम:।
गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात् पन्नगभोजन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
आकाश में विचरण करने वाले ये सर्पभक्षी पक्षी भारी भार लेकर उड़े हैं; इसलिए (‘गुरुं आदया उद्दिन इति गरुड़:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार) इनका नाम गरुड़ होगा॥7॥
 
These serpent-eating birds roaming in the sky have flown with a heavy load; Therefore (according to the etymology ‘Gurum Aadaya Uddin Iti Garuda:’) he will be called Garuda. 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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