श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.30.50 
तै: शस्त्रैर्भानुमद्भिस्ते दिव्याभरणभूषिता:।
भानुमन्त: सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मषा:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
दिव्य आभूषणों से विभूषित पापरहित देवतागण चमकते हुए अस्त्र-शस्त्रों से अधिक चमक रहे थे ॥50॥
 
The sinless gods, adorned with divine ornaments, were shining more radiantly with dazzling weapons. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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