श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.30.46 
धारयन्तो विचित्राणि काञ्चनानि मनस्विन:।
कवचानि महार्हाणि वैदूर्यविकृतानि च॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
मनस्वी देवता विचित्र स्वर्णमय एवं बहुमूल्य वैदूर्यमणि के समान कवच धारण करने लगे ॥46॥
 
Manasvi deity started wearing strange golden and precious Vaidurya gem-like armour. 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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