श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.30.43 
सौतिरुवाच
श्रुत्वैतद् वचनं शक्र: प्रोवाचामृतरक्षिण:।
महावीर्यबल: पक्षी हर्तुं सोममिहोद्यत:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - बृहस्पतिजी के ये वचन सुनकर देवराज इन्द्र ने अमृत की रक्षा करने वाले देवताओं से कहा - 'रक्षकों! अत्यन्त बलवान और पराक्रमी पक्षी गरुड़ यहाँ से अमृत ले जाने के लिए तत्पर है ॥ 43॥
 
Ugrasravaji says - On hearing these words of Brihaspatiji, Devaraj Indra said to the gods who were protecting the nectar - 'Protectors! The very powerful and valiant bird Garuda is ready to take away the nectar from here. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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