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श्लोक 1.30.43  |
सौतिरुवाच
श्रुत्वैतद् वचनं शक्र: प्रोवाचामृतरक्षिण:।
महावीर्यबल: पक्षी हर्तुं सोममिहोद्यत:॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| उग्रश्रवाजी कहते हैं - बृहस्पतिजी के ये वचन सुनकर देवराज इन्द्र ने अमृत की रक्षा करने वाले देवताओं से कहा - 'रक्षकों! अत्यन्त बलवान और पराक्रमी पक्षी गरुड़ यहाँ से अमृत ले जाने के लिए तत्पर है ॥ 43॥ |
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| Ugrasravaji says - On hearing these words of Brihaspatiji, Devaraj Indra said to the gods who were protecting the nectar - 'Protectors! The very powerful and valiant bird Garuda is ready to take away the nectar from here. ॥ 43॥ |
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