श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.30.42 
समर्थो बलिनां श्रेष्ठो हर्तुं सोमं विहंगम:।
सर्वं सम्भावयाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधयेत्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
बलवानों में श्रेष्ठ, उड़ने वाला वह गरुड़ अमृत चुराने में समर्थ है। मैं देखता हूँ कि उसमें सब प्रकार की शक्तियाँ हैं। वह असंभव कार्य भी कर सकता है। ॥42॥
 
The great flying Garuda, the greatest of the strong ones, is capable of stealing the nectar. I foresee that he has all kinds of powers. He can accomplish even impossible tasks. ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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