श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  1.30.40-41 
बृहस्पतिरुवाच
तवापराधाद् देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो।
तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम्॥ ४०॥
कश्यपस्य मुने: पुत्रो विनतायाश्च खेचर:।
हर्तुं सोममभिप्राप्तो बलवान् कामरूपधृक्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पतिजी बोले- देवराज इन्द्र! आपके ही अपराध और प्रमाद के कारण तथा महात्मा वालखिल्य महर्षि की तपस्या के प्रभाव से कश्यप मुनि और विनता के पुत्र पक्षीराज गरुड़ अमृत का अपहरण करने आ रहे हैं। वे अत्यन्त बलवान हैं और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं। 40-41॥
 
Brihaspatiji said- Devraj Indra! Due to your own crime and negligence and due to the influence of penance of Mahatma Valakhilya Maharishi, Kashyap Muni and Vinata's son Pakshiraj Garuda are coming to kidnap the nectar. They are very strong and capable of taking any form as per their wish. 40-41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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