श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.30.37 
मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि।
उत्पातमेघा रौद्राश्च ववृषु: शोणितं बहु॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
देवताओं की दिव्य मालाएँ मुरझा गईं और उनकी प्रभा क्षीण होने लगी। अनेक भयंकर उत्पात के बादल प्रकट हुए और भारी मात्रा में रक्त की वर्षा करने लगे। 37.
 
The divine garlands of the gods withered and their radiance began to wane. Many terrifying clouds of mayhem appeared and began to rain blood in great quantities. 37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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