श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.30.36 
निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम्।
देवानामपि यो देव: सोऽप्यवर्षत शोणितम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
आकाश में बादल न होने पर भी आकाश से बड़ी गर्जना होने लगी। देवों के देव पर्जन्य ने रक्त की वर्षा शुरू कर दी। 36.
 
Even though there were no clouds in the sky, a very loud roar started coming from the sky. The god of gods, Parjanya, started raining blood. 36.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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