श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 33-35
 
 
श्लोक  1.30.33-35 
सधूमा न्यपतत् सार्चिर्दिवोल्का नभसश्च्युता।
तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वश:॥ ३३॥
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणा:।
स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत्॥ ३४॥
अभूतपूर्वं संग्रामे तदा देवासुरेऽपि च।
ववुर्वाता: सनिर्घाता: पेतुरुल्का: सहस्रश:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
दिन के उजाले में आकाश से धुएँ और ज्वालाओं के साथ उल्काएँ गिरने लगीं। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुद्गण आदि देवताओं के अस्त्र-शस्त्र आपस में इस प्रकार लड़ने लगे, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। ऐसी अनोखी घटना तो देवताओं और दानवों के युद्ध में भी नहीं घटी थी। तभी गड़गड़ाहट के साथ एक प्रचंड आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं।
 
Meteors started falling from the sky in broad daylight along with smoke and flames. The weapons of Vasu, Rudra, Aditya, Sadhya, Marudgan and other gods started fighting with each other in a way which was never seen before. Such an unusual thing had not happened even during the war between gods and demons. At that time a strong storm started rising along with the rumbling of thunder. Thousands of meteors started falling.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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