श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.30.27 
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्तत:।
मणिकाञ्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उस पर्वत की विचित्र, मणि-सदृश चोटियाँ, जो उस महान शिला की शोभा बढ़ा रही थीं, सब ओर से टूटकर गिर पड़ीं।
 
The strange, gem-like peaks of that mountain, which were enhancing the beauty of that great rock, fell down shattered from all sides. 27.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd