श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.30.23 
न तां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुम्।
शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खग:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
गरुड़जी अपनी चोंच में जिस वटवृक्ष की विशाल शाखा को उठाए हुए थे, वह इतनी मोटी थी कि सौ पशुओं की खालों से बनी रस्सी भी उसे लपेट नहीं सकती थी॥ 23॥
 
The huge branch of the Banyan tree which Garuda was carrying in his beak was so thick that even a rope made from the skins of a hundred animals could not wrap it around.॥ 23॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd