श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.30.20 
भगवन् क्व विमुञ्चामि तरो: शाखामिमामहम्।
वर्जितं मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान् मम॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'हे प्रभु! मैं इस पेड़ की शाखा को कहाँ रखूँ? कृपया मुझे कोई ऐसी जगह बताएँ जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान न रहता हो।'
 
'Lord! Where should I leave this branch of the tree? Please tell me a place where there are no humans living for a long distance.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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