श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.30.18 
सौतिरुवाच
एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययु:।
मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - भगवान कश्यप के इस प्रकार कहने पर वालखिल्य मुनि उस शाखा को छोड़कर परम पुण्यशाली हिमालय पर तपस्या करने चले गए ॥18॥
 
Ugrashravaji says - On this request of Lord Kashyap, Valakhilya Muni left that branch and went to the most virtuous Himalayas to do penance. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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