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श्लोक 1.30.18  |
सौतिरुवाच
एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययु:।
मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिन:॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| उग्रश्रवाजी कहते हैं - भगवान कश्यप के इस प्रकार कहने पर वालखिल्य मुनि उस शाखा को छोड़कर परम पुण्यशाली हिमालय पर तपस्या करने चले गए ॥18॥ |
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| Ugrashravaji says - On this request of Lord Kashyap, Valakhilya Muni left that branch and went to the most virtuous Himalayas to do penance. 18॥ |
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