श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.30.17 
कश्यप उवाच
प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधना:।
चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमर्हथ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कश्यपजी ने कहा- हे तपस्वियों! गरुड़ यह कार्य लोक कल्याण के लिए कर रहे हैं। वे एक महान पराक्रम करना चाहते हैं, आप लोग उन्हें अनुमति प्रदान करें।
 
Kashyapji said- O ascetics! Garuda is doing this work for the welfare of the people. He wants to perform a great feat, you all please give him permission.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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