श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.30.14 
लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम्।
तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान् कश्यपस्तदा।
विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमब्रवीत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वे समस्त जगत को भय से काँपने लगे थे। उनकी मूर्ति अत्यंत भयानक थी। वे यमराज के समान ही दिखते थे। उन्हें आते देख, उस समय भगवान कश्यप ने उनका निश्चय जानकर इस प्रकार कहा॥14॥
 
He used to make the entire world tremble with fear. His statue was very terrible. He looked exactly like Yamraj. Seeing him coming, at that time Lord Kashyapa knowing his resolve said thus. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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