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mahabharat 1.30.10-11: वहाँ उन्होंने अपने पिता कश्यपजी को ध्यान में लीन देखा। पिता ने अपने पुत्र को भी देखा। पक्षीराज का रूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बल से संपन्न थे और मन तथा वायु के समान वेगवान थे। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो वे किसी पर्वत शिखर के समान हों। वे उठे हुए ब्रह्मदंड के समान प्रतीत होते थे। 10-11।   |   mahabharat अध्याय 1.30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  1.30.10-11 
ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम्।
ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम्॥ १०॥
तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम्।
शैलशृङ्गप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उन्होंने अपने पिता कश्यपजी को ध्यान में लीन देखा। पिता ने अपने पुत्र को भी देखा। पक्षीराज का रूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बल से संपन्न थे और मन तथा वायु के समान वेगवान थे। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो वे किसी पर्वत शिखर के समान हों। वे उठे हुए ब्रह्मदंड के समान प्रतीत होते थे। 10-11।
 
There he saw his father Kashyapji engaged in meditation. The father also saw his son. The form of the bird king was divine. He was endowed with brilliance, valour and strength and was as swift as the mind and the wind. Looking at him one could feel the peak of a mountain. He looked like a raised Brahmadanda. 10-11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)