श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  1.3.99 
भो उत्तङ्कैतत् पुरीषमस्य ऋषभस्य भक्षयस्वेति स एवमुक्तो नैच्छत्॥ ९९॥
 
 
अनुवाद
‘उत्तंक! तुम इस बैल का गोबर खाओ।’ किन्तु उसके ऐसा कहने पर भी उत्तंक का उस गोबर को खाने का मन नहीं हुआ।
 
'Uttank! You eat the dung of this bull.' But even after he said so, Uttank did not feel like eating that dung.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)