श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  1.3.98 
स एवमुक्तस्तया प्रातिष्ठतोत्तङ्क: स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव स पुरुष उत्तङ्कमभ्यभाषत॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
गुरुपत्नी की यह बात सुनकर उत्तंक वहाँ से चले गए। मार्ग में उन्होंने एक बहुत बड़ा बैल और उस पर सवार एक विशाल पुरुष को देखा। उस पुरुष ने उत्तंक से कहा -॥98॥
 
On hearing the Guru's wife say this, Uttanka left from there. On the way, he saw a very big bull and a huge man riding on it. That man said to Uttanka -॥98॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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