स एवमुक्त उपाध्यायेनोपाध्यायानीमपृच्छद् भगवत्युपाध्यायेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुमिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुमिति॥ ९५॥ तदाज्ञापयतु भवती किमुपाहरामि गुर्वर्थमिति।
अनुवाद
उपाध्याय की यह बात सुनकर उत्तंक ने गुरुपत्नी से पूछा - 'देवि! उपाध्याय ने मुझे घर जाने की आज्ञा दी है, अतः मैं आपको गुरुदक्षिणा में कोई इच्छित वस्तु भेंट करके गुरुऋण से उऋण होना चाहता हूँ। अतः आज्ञा दीजिए; मैं गुरुदक्षिणा में क्या वस्तु लाऊँ?'
On hearing Upadhyaya say this, Uttanka asked the Guru's wife - 'Devi! Upadhyaya has ordered me to go home, so I want to repay the debt of the Guru by presenting you some desired thing as Gurudakshina. 95. So please order; what thing should I bring as Gurudakshina?'