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mahabharat 1.3.94: यह सुनकर उपाध्याय ने उससे कहा - 'बेटा उत्तंक! तुम मुझसे बार-बार पूछते हो कि 'मैं गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?' इसलिए जाओ, अपने घर में जाकर अपनी गुरुपत्नी से पूछो कि 'मैं गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?'॥ 94॥ 'वह जो कुछ कहे, उसे दे दो।'   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  1.3.94 
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क बहुशो मां चोदयसि गुर्वर्थमुपाहरामीति तद् गच्छैनां प्रविश्योपाध्यायानीं पृच्छ किमुपाहरामीति॥ ९४॥ एषा यद् ब्रवीति तदुपाहरस्वेति।
 
 
अनुवाद
यह सुनकर उपाध्याय ने उससे कहा - 'बेटा उत्तंक! तुम मुझसे बार-बार पूछते हो कि 'मैं गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?' इसलिए जाओ, अपने घर में जाकर अपनी गुरुपत्नी से पूछो कि 'मैं गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?'॥ 94॥ 'वह जो कुछ कहे, उसे दे दो।'
 
Hearing this, the Upadhyaya said to him - 'Son Uttank! You keep asking me again and again, 'What should I offer as Gurudakshina?' So go, enter your house and ask your Guru's wife, 'What should I offer as Gurudakshina?'॥ 94॥ 'Gift her whatever she tells you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)