स कदाचिदुपाध्यायमाहोत्तङ्क आज्ञापयतु भवान् किं ते प्रियमुपाहरामि गुर्वर्थमिति॥ ९३॥
अनुवाद
तत्पश्चात् एक दिन उत्तंक ने पुनः उपाध्याय से कहा - 'भगवन्! कृपया आज्ञा करें कि मैं आपकी प्रिय वस्तुओं में से कौन-सी वस्तु आपको गुरुदक्षिणा में भेंट करूँ?'॥ 93॥
Thereafter one day Uttanka again said to Upadhyaya - 'Lord! Please order, which of your favourite things should I present to you as Gurudakshina?'॥ 93॥