श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  1.3.91 
यश्चाधर्मेण वै ब्रूयाद् यश्चाधर्मेण पृच्छति।
तयोरन्यतर: प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अधर्मपूर्वक शिक्षा या उपदेश देता है, अधर्मपूर्वक प्रश्न करता है या अध्ययन करता है, उन दोनों (गुरु या शिष्य) में से एक को मृत्यु और घृणा प्राप्त होती है ॥91॥
 
One who teaches or preaches unrighteously or questions or studies unrighteously, one of the two (teacher or disciple) receives death and hatred. 91॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)