| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 9 |
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| | | | श्लोक 1.3.9  | | न किञ्चिदुक्तवन्तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति॥ ९॥ | | | | | | अनुवाद | | परन्तु जनमेजय और उसके भाइयों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। तब सरमा ने उनसे कहा, 'मेरा पुत्र निर्दोष था, फिर भी तुमने उसे मार डाला; इसलिए तुम पर अचानक ऐसा भय छा जाएगा, जिसकी पहले से आशा नहीं थी।'॥9॥ | | | | But Janamejaya and his brothers did not answer this question. Then Sarma said to them, 'My son was innocent, yet you killed him; therefore, such a fear will suddenly descend on you, which was not expected beforehand.'॥ 9॥ | | ✨ ai-generated | | |
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