श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.3.89 
उवाच चैनं वत्सोत्तङ्क किं ते प्रियं करवाणीति। धर्मतो हि शुश्रूषितोऽस्मि भवता तेन प्रीति: परस्परेण नौ संवृद्धा तदनुजाने भवन्तं सर्वानेव कामानवाप्स्यसि गम्यतामिति॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
और बोले, 'पुत्र उत्तंक! तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य मैं करूँ? तुमने धर्मपूर्वक मेरी सेवा की है। इससे हमारा परस्पर प्रेम बहुत बढ़ गया है। अब मैं तुम्हें घर लौटने की अनुमति देता हूँ - जाओ, तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।'॥89॥
 
And he said, 'Son Uttanka! Which of your favourite tasks should I perform? You have served me righteously. Due to this our love for each other has increased a lot. Now I give you permission to return home - go, all your wishes will be fulfilled.'॥ 89॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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