श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.3.87 
एवमुक्तस्ता: स्त्रिय: प्रत्युवाच न मया स्त्रीणां वचनादिदमकार्यं करणीयम्। न ह्यहमुपाध्यायेन संदिष्टोऽकार्यमपि त्वया कार्यमिति॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर उत्तंक ने उत्तर दिया, 'स्त्रियों के कहने पर मैं यह निन्दनीय कार्य नहीं कर सकता। उपाध्याय ने मुझे ऐसा करने का आदेश नहीं दिया है, जो करने योग्य नहीं है।' 87
 
Hearing this, Uttanka replied, 'I cannot do this reprehensible act at the behest of women. Upadhyaya has not ordered me to do this act which is not to be done.' 87
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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