श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  1.3.86 
उपाध्यायानी ते ऋतुमती, उपाध्यायश्च प्रोषितोऽस्या यथायमृतुर्वन्ध्यो न भवति तथा क्रियतामेषा विषीदतीति॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
आपके गुरु की पत्नी रजस्वला हो गई हैं और उपाध्याय विदेश चले गए हैं। आप कुछ ऐसा करें कि उनका रजस्वला काल व्यर्थ न जाए; इसके लिए गुरु की पत्नी बहुत चिंतित हैं ॥ 86॥
 
Your Guru's wife has menstruated and Upadhyaya has gone abroad. Do something so that her menstrual period does not go waste; for this the Guru's wife is very worried. ॥ 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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