श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.3.85 
अथोत्तङ्क: शुश्रूषुर्गुरुनियोगमनुतिष्ठमानो गुरुकुले वसति स्म। स तत्र वसमान उपाध्यायस्त्रीभि: सहिताभिराहूयोक्त:॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने गुरु की आज्ञा मानकर गुरु के घर में सेवाभाव से रहने लगे। जब वे वहाँ रह रहे थे, तब उपाध्याय के संरक्षण में रहने वाली समस्त स्त्रियों ने उन्हें बुलाकर कहा -॥85॥
 
Uttanka obeyed the orders of his Guru and started living in his Guru's house, devoted to service. While he was living there, all the women living under the protection of Upadhyaya called him together and said -॥ 85॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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